शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

केन्द्रीय विद्यालयों में सरस्वती वंदना पर रोक क्यों ?



ऐसा लगता है कि देश में सेकुलरवाद के नाम पर हिन्दू आस्थाओं पर कुठाराघात करने का चलन सा हो गया है यह भी कहा जा सकता है कि आज हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ ही सेकुलरवाद की परिभाषा बन गई है इसलिए देश के तथाकथित सेकुलरवादी हिन्दू भावनाओं पर चोट करने का कोई न कोई मौका ढूंढ ही लेते हैं, ताकि खांटी सेकुलरवादी होने का तमगा उन्हें मिल सके इस बार सेकुलरवाद की भेंट अजमेर (राजस्थान) के दो केन्द्रीय विद्यालय चढ़े । इन विद्यालयों में होने वाली सरस्वती वंदना पर घृणित सेकुलरवादी सोच के चलते रोक लगा दी गई है । अजमेर के दो केंद्रीय विद्यालयों (केन्द्रीय विद्यालय-1 और 2) ने वार्षिकोत्सव और अन्य समारोहों में होने वाली सरस्वती वंदना पर रोक लगा दी है। इन विद्यालयों ने वेबसाइट से मां सरस्वती का चित्र भी हटा दिया है। भारत में सदियों से मां सरस्वती को ज्ञान-विज्ञान की देवी और सद्बुद्धि की दाता के रूप में पूजा जाता है। किंतु सेकुलरवाद के नाम पर सरस्वती वंदना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश होती आई है। अजमेर की इस घटना पर सांप्रदायिक सौहाद्र्र का अलख जगाने वाले स्वयंभू बुद्घिजीवियों का मौन उनकी दोहरी मानसिकता का ही प्रमाण है। अजमेर में सक्रिय रेशनलिस्ट सोसायटी द्वारा लंबे समय से सरस्वती वंदना पर आपत्ति प्रकट किए जाने के कारण कथित तौर पर इन विद्यालयों को उक्त निर्णय लेना पड़ है। रेशनलिस्ट सोसायटी देश के सभी सरकारी-गैर सरकारी विद्यालयों में सरस्वती वंदना पर रोक लगाने का हिमायती है। सोसायटी का तर्क है कि सरस्वती वंदना से भारत के पंथनिरपेक्ष स्वरूप पर खतरा पैदा होता है। निरीश्वरवादियों के इस तर्क को मानें तो हमें अपने कई राष्ट्रीय प्रतीकों में भी बदलाव करने होंगे। क्या हम ’सत्यमेव जयते‘ की अपनी मान्यता को केवल इसलिए छाड़ दें कि यह मांडूक्य उपनिषद से ली गई है? या जीवन बीमा निगम के साथ युक्त सूक्ति -‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ का परित्याग कर दिया जाए क्योंकि वह भागवत गीता से उद्घृत है? इसी तरह क्या राष्ट्रीय झंडे से धर्मचक्र को भी निकाल देना चाहिए क्योंकि यह पंथ पंथनिरपेक्षता के विरुद्घ है? भारतीय रिजर्व बैंक के सामने स्थित यक्ष और यक्षिणी की मूर्ति ध्वस्त कर देनी चाहिए क्योंकि वे भारतीय आर्षग्रंथों के मिथकीय पात्र हैं? कनाडा के संसद में लक्ष्मी की पूजा होती है और वे इस दिवस को ‘‘आध्यात्मिक अंधकार के अंत’’ के रूप में मनाते हैं। आयरलैंड के नई दिल्ली स्थित दूतावास में गणेश प्रतिमा की प्रत्येक दिन पूजा-अर्चना की जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइबिल पर हाथ रखकर पद की शपथ लेते हैं और डॉलर पर यह छपा होता है- हमें परमपिता पर विश्वास है। मुस्लिम बहुल देश होने और ३० वर्षों तक कम्युनिस्टी तानाशाही से शासित होने के बावजूद इंडोनेशिया ने पूर्वी एशियाई संकट के बाद एक नई मुद्रा-रुपिया चलाई। भारतीय सौ रुपए के समतुल्य बीस हजार इंडोनेशियाई रुपिया में भगवान गणेश विराजमान हैं। क्या ऐसी मान्यताओं व परंपराओं के कारण इन देशों को पंथनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं माना जाए? भारतवर्ष के संविधान में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा निरीश्वरवाद नहीं, बल्कि सभी मतों को समान अवसर और उनके क्रियाकलाप में राज्य की दखलंदाजी नहीं होने से संबद्घ है। पश्चिम में भी पंथनिरपेक्षता का आशय राज्य से चर्च का पृथकीकरण ही है। उसका एक कारण यह भी था कि ईसाई जगत में चर्च राज्य के साथ प्रतिद्वंद्विता करने वाली शक्ति का केन्द्र बन गया था। इसके विपरीत भारतवर्ष में उपासना पद्घति और राज्य शक्ति में ना तो कभी विरोध और न ही कभी साम्य रहा। दोनों के क्षेत्र अलग-अलग रहे। वहीं ज्यादातर मुस्लिम देशों में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा कल्पना से परे है।
सरस्वती वंदना पर प्रतिबंध का समर्थन करने वाले सेकुलरिस्ट ‘वंदे मातरम्’ गीत को भी सांप्रदायिक मानते हैं। वंदे मातरम् राष्ट्रगीत है और संविधान में इसे राष्ट्रगान के बराबर सम्मान प्राप्त है। संविधान किसी भी नागरिक को राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, किंतु राष्ट्र की अस्मिता से जुड़े प्रतीकों के लिए हर नागरिक में सम्मान भाव हो, ऐसी अपेक्षा स्वाभाविक है। भारत की सनातनी संस्कृति ने ही यहां के बहुसंख्यकों को विश्व बंधुत्व का शाश्वत संदेश दिया। इस्लाम सहित कई अन्य मत भारत में पल्लवित व पुष्पित हुए तो उसका सारा श्रेय इसी सनातन संस्कृति को है। संविधान में प्रजातंत्र और पंथनिरपेक्ष व्यवस्था भी केवल इसलिए संभव हो पाई, क्योंकि भारत का अधिकांश जनमत सनातन परंपरा से है और बहुलवाद में विश्वास रखता है। इस कालजयी राष्ट्र की सांस्कृतिक ज$डों को खोखला करने वाले सेकुलरिस्ट वस्तुतरू भारत की बहुलतावादी संस्कृति के विरोधी हैं।
अजमेर की इस घटना से एक बात तो साफ है कि इस देश में सेकुलरवाद के नाम पर हिन्दुओं की भावनाओं को ही आहत किया जाता है किसी अन्य मत-पंथ (मुस्लिम, ईसाई आदि) की भावनाओं को आहत करने का साहस इन तथाकथित सेकुलरवादियों में नहीं है क्योंकि इन्हें पता है कि अगर इन्होंने किसी अन्य मत-पंथ के लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाई तो वे इनकी ईंट से ईंट बजा देंगे । अब प्रश्न उठता है कि आखिर कब तक हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ होता रहेगा ? इसका एक ही जवाब है कि जब तक हिन्दू समाज ऐसे कृत्यों का विरोध नहीं करेगा तब तक यह सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा।

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